पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) तथा नेशनल इलेक्शन वॉच की एक रिपोर्ट में 28 राज्यों एवं 3 केंद्रशासित प्रदेशों के सभी वर्तमान मुख्यमंत्रियों द्वारा निर्वाचन के समय प्रस्तुत स्व-घोषित शपथपत्रों का विश्लेषण किया गया है।
प्रमुख बिंदु
- भारत के वर्तमान 31 मुख्यमंत्रियों में से 45% (14) के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज हैं।


- महिलाओं का प्रतिनिधित्व: 31 मुख्यमंत्रियों में केवल एक, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, महिला हैं।
- राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं में कुल 4123 प्रतिनिधियों में से केवल 390 महिलाएँ (9%) विधायक हैं।
- शैक्षिक योग्यता: 9 (29%) मुख्यमंत्री स्नातकोत्तर हैं, जो सबसे बड़ा समूह है। इनके बाद 7 (23%) स्नातक तथा 6 (19%) व्यावसायिक स्नातक हैं।
- 3 मुख्यमंत्रियों के पास डॉक्टरेट की उपाधि है, जबकि 2 ने केवल कक्षा 10 तक ही शिक्षा प्राप्त की है।
राजनीति के अपराधीकरण के कारण
- कमजोर अयोग्यता संबंधी प्रावधान: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, उम्मीदवार केवल दोषसिद्धि के बाद ही अयोग्य घोषित होता है। चूँकि न्यायिक प्रक्रिया में वर्षों लग जाते हैं, इसलिए निर्णय आने से पूर्व उम्मीदवार कई चुनाव लड़ लेते हैं।
- धनबल एवं बाहुबल: आर्थिक संसाधनों तथा स्थानीय प्रभाव वाले उम्मीदवारों को राजनीतिक दल अधिक विजयी होने की संभावना वाले उम्मीदवार मानते हैं।
- मतदाताओं में जागरूकता का अभाव: यद्यपि उम्मीदवारों के शपथपत्रों में उनकी पृष्ठभूमि का विवरण उपलब्ध होता है, फिर भी अनेक मतदाता इससे अनभिज्ञ रहते हैं अथवा जाति एवं धर्म के आधार पर मतदान करते हैं।
- राजनीतिक दलों की मिलीभगत: राजनीतिक दल कई बार उम्मीदवारों की लोकप्रियता तथा उनकी चुनाव जीतने की संभावना का आधार बनाकर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को टिकट प्रदान करते हैं।
- न्यायिक प्रक्रिया में विलंब: बार-बार स्थगन तथा लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि में विलंब होता है, जिससे अपराधी दंड से बच निकलते हैं।
राजनीति के अपराधीकरण के प्रभाव
- लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास: यह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की मूल भावना को कमजोर करता है। मतदाताओं के विकल्प सीमित हो जाते हैं, जिससे प्रतिनिधिक लोकतंत्र की भावना प्रभावित होती है।
- भ्रष्टाचार में वृद्धि: राजनीति में आपराधिक तत्वों की उपस्थिति से मतदाताओं को डराना-धमकाना, मतदान केंद्रों पर नियन्त्रण करना तथा चुनाव प्रचार में काले धन का उपयोग जैसी चुनावी अनियमितताएँ बढ़ जाती हैं।
- जनविश्वास में कमी: दागी जनप्रतिनिधियों के बार-बार निर्वाचित होने से मतदाता सहभागिता में कमी आती है तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास कमजोर होता है।
- नीतिनिर्माण में विकृति: निर्वाचित प्रतिनिधि राजनीतिक शक्ति का उपयोग अपने व्यक्तिगत एवं आपराधिक नेटवर्क को संरक्षण देने के लिए करते हैं, जिससे नीतिनिर्माण जनहित के स्थान पर निजी हितों की ओर उन्मुख हो जाता है।
प्रमुख समितियों की सिफारिशें
- इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) एवं द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007): इन समितियों ने चुनावों में काले धन के उपयोग पर अंकुश लगाने तथा भ्रष्टाचार कम करने के लिए चुनावों के आंशिक राज्य पोषण की सिफारिश की।
- संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (2002): आयोग ने राजनीतिक दलों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए दलों के व्यय का वैधानिक लेखा-परीक्षण तथा उम्मीदवारों की परिसंपत्तियों एवं देनदारियों के अनिवार्य प्रकटीकरण की सिफारिश की।
- विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट (2014): रिपोर्ट में अनुशंसा की गई कि जिन अपराधों में पाँच वर्ष या उससे अधिक की अधिकतम सजा का प्रावधान है, उनमें आरोप तय होते ही संबंधित राजनेता को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए।
- रिपोर्ट में वर्तमान सांसदों एवं विधायकों के विरुद्ध लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे हेतु त्वरित न्यायालयों की स्थापना की भी सिफारिश की गई।
उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप
- लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013): उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि किसी सांसद, विधायक अथवा विधान परिषद सदस्य को किसी अपराध में दो वर्ष या उससे अधिक के कारावास की सजा होती है, तो वह तत्काल प्रभाव से अयोग्य हो जाएगा।
- पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे अपने उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों का विवरण, अपराधों की प्रकृति एवं आरोपों सहित सार्वजनिक करें।
- वर्ष 2020 का निर्देश: उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे आपराधिक मामलों का सामना कर रहे उम्मीदवारों का विवरण, उनके चयन के कारणों सहित, उम्मीदवार घोषित किए जाने के 48 घंटे के अंदर अपनी वेबसाइट, सामाजिक माध्यमों तथा समाचार-पत्रों में प्रकाशित करें।
130वाँ संविधान संशोधन विधेयक
- पृष्ठभूमि: यह विधेयक वर्ष 2025 में प्रस्तुत किया गया तथा व्यापक विपक्षी विरोध के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया।
- प्रमुख प्रावधान: यदि किसी मंत्री पर ऐसे अपराध का आरोप हो, जिसमें पाँच वर्ष या उससे अधिक के कारावास का प्रावधान हो तथा उसे लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में रखा गया हो, तो उसे पद से हटाया जा सकेगा।
- यदि प्रधानमंत्री अथवा कोई मुख्यमंत्री लगातार 30 दिनों तक अभिरक्षा में रहता है, तो उसे त्यागपत्र देना होगा; अन्यथा 31वें दिन उसका पद स्वतः समाप्त हो जाएगा।
- मंत्री को पद से हटाने का आदेश राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल द्वारा क्रमशः प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री के परामर्श पर दिया जा सकेगा, अथवा 31वें दिन स्वतः पद समाप्त हो जाएगा।
- वर्तमान में मंत्री केवल त्यागपत्र, प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री द्वारा पद से हटाए जाने, अथवा प्रचलित कानूनों के अंतर्गत दोषसिद्धि के पश्चात अयोग्यता के आधार पर ही पद छोड़ते हैं।
निष्कर्ष
- निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की आपराधिक पृष्ठभूमि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को कमजोर करती है, विधि के शासन को प्रभावित करती है तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को कम करती है।
- इस समस्या के समाधान के लिए निर्वाचन सुधार, आपराधिक मामलों का शीघ्र निपटारा, राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता तथा जागरूक एवं सूचित मतदाता सहभागिता को सुनिश्चित करना आवश्यक है।
स्रोत: TH
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